नवाबों का शहर लखनऊ सिर्फ़ इमारतों और इत्र की खुशबू तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत किस्सों में बसता है जो आज भी यहाँ की गलियों में सांस लेते हैं। पुराने लखनऊ के ये किस्से तहज़ीब, अदब और इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश करते हैं, जो आज के दौर में दुर्लभ होती जा रही है।
कहते हैं कि पुराने लखनऊ में लड़ाइयाँ भी शालीनता से लड़ी जाती थीं। एक मशहूर किस्सा है कि दो नवाबी परिवारों में गहरी रंजिश थी, लेकिन जब एक पक्ष के घर शादी थी तो दूसरे पक्ष ने पहले मुबारकबाद भिजवाई और कहा—“पहले रस्में पूरी हो जाएँ, फिर दुश्मनी निभाई जाएगी।” यही थी लखनऊ की तहज़ीब।
एक और किस्सा चौक की गलियों से जुड़ा है, जहाँ अगर कोई मेहमान रास्ता पूछ लेता था तो उसे सिर्फ़ रास्ता नहीं, बल्कि चाय और शीरमाल भी मिल जाता था। मेहमाननवाज़ी यहाँ ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि फख़्र मानी जाती थी।
पुराने लखनऊ में बोलचाल का भी एक खास अंदाज़ था। गाली देना बदतमीज़ी समझी जाती थी, इसलिए नाराज़गी भी नज़ाकत से जताई जाती थी। “आप तशरीफ़ तो रखिए, मगर ज़रा कम” जैसे जुमले आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि पुराने लखनऊ के ये किस्से सिर्फ़ यादें नहीं, बल्कि एक सोच हैं—जहाँ इज़्ज़त, सब्र और इंसानियत सबसे ऊपर रखी जाती थी। बदलते समय के साथ शहर की शक्ल भले बदल गई हो, लेकिन पुराने लखनऊ की रूह आज भी इन किस्सों के ज़रिए ज़िंदा है।
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